आधारभूत ब्रह्माण्ड

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पुस्तक के अंश


पुस्तक की विषय सूची आपके लिए नीचे प्रस्तुत है।

भाग 1 : आधारभूत ब्रह्माण्ड, इकाई और इकाई रूप

  1. ब्रह्माण्ड का एकीकरण सिद्धांत
    पदार्थ का एकीकरण सिद्धांत
    अस्तित्व
    समय
  2. पदार्थ की आयामिक अवस्थाएँ
    शून्य आयामिक द्रव्य
    एक आयामिक द्रव्य
    दो आयामिक द्रव्य
    रुद्राक्ष आयामिक द्रव्य
    तीन आयामिक द्रव्य
    चार आयामिक द्रव्य
  3. आयामिक पदार्थ का आपसी सम्बन्ध
    बिग- बैंग घटनाक्रम
    प्रकाश
    गुरुत्वाकर्षण
    ब्लैक होल
    मुझ में द्रव्य का भाग
  4. आधारभूत ब्रह्माण्ड का गणितीय रूप
    अनंत
    समीकरण A से V तक के निष्कर्ष
    प्रायकिता
  5. ऊर्जा के समरूप
    ऊर्जा और शक्ति
    तकनीकी उपयोगी ऊर्जा
  6. आधारभूत ब्रह्माण्ड का अस्तित्व
    ठोसीय ब्रह्माण्ड
    द्रवीय ब्रह्माण्ड
    पदीय ब्रह्माण्ड
    उद्देशीय ब्रह्माण्ड

भाग 2 : नियम, उनका पालन और ब्रह्माण्ड के समूह

  1. नियम और उनका पालन
    जड़त्वीय और अजड़त्वीय तंत्र
  2. ब्रह्माण्ड के समूह
    जड़त्वीय तंत्र या भौतिकता के आधार पर
    अजड़त्वीय तंत्र या चित्रण के आधार पर
  3. प्रायोगिक आधारभूत
  4. असैद्धांतिक आधारभूत                                                                                        पुस्तक लेखन का कार्य निरंतर अग्रसर है।

  ~ ~ ~   ~ ~ ~    ~ ~ ~ ~ महा-एकीकृत वर्गीकरण ~ ~ ~ ~    ~ ~ ~   ~ ~ ~


2 टिप्पणियाँ

  1. Anmol Einstein कहते हैं:

    अज़ीज़ जी,
    यह जानकर अच्छा लगा कि आप इस विषय पर हिंदी में पुस्तक लिख रहे हैं, यह एक प्रशंसनीय कार्य है। मुझे इन्तेजार रहेगा आपकी पुस्तक का..।
    मैं भी इस विषय पर पुस्तक लिखने की सोंच रहा था, पर उसके लिए मुझे पहले खुद ही बहुत कुछ पढ़ना था। इस विषय के ऐसे कई अंग हैं जिसकी अभी मुझे पर्याप्त जानकारी नहीं है। इसलिए सोंचा था कि इस विषय में पर्याप्त जानकारी इकठ्ठा करके मैं पुस्तक लिखने का कार्य प्रारंभ करूंगा, पर ‘गॉड पार्टिकल के रहस्य’ पढ़ने के बाद मन बदल गया। क्यूंकि अगर मैं अभी अपनी पुस्तक लिखता तो वो भी लगभग ‘गॉड पार्टिकल के रहस्य’ जैसी ही होती। उस जैसी का मतलब पुस्तक में ये कमियाँ होतीं…
    १. विश्सनीय संदर्भो का अभाव होना क्योंकि यह विज्ञान है। कोई कहानी, दर्शन या आत्म-विचार नहीं..
    २. खुद विषय पर केवल एक श्रोत से प्राप्त जानकारी होना। जिससे प्राप्त जानकारी को शत प्रतिशत सही नहीं माना जा सकता।
    ३ .केवल एक-दो सम्बंधित पुस्तक पढ़कर और ‘विज्ञान-विश्व’ जैसे श्रोतों से जानकारी पढ़कर ही विषय के जानकर बनना आदि..
    इसलिए मैंने निर्णय किया कि अभी फिलहाल कोई पुस्तक नहीं लिखूंगा, जब तक की मेरी उपर्युक्त तीनों कमियाँ ख़त्म न हो जाएँ। अभी मुझे बहुत कुछ पढ़ना है। इस विषय पर लगभग हर लेखक की कम से कम एक पुस्तक तो जरूर ही पढ़ना है। उसके बाद ही पुस्तक लिखनें का कार्य प्रारंभ करना है।
    खैर, आपसे यह कहना था कि आप पुस्तक हिंदी में लिख रहे हैं। यह तो अच्छा है, पर आपकी हिंदी भाषा को समझनें में थोड़ी कठिनता होती है। आपके द्वारा लिखित अधिकतर वाक्य-समूहों को समझने में थोड़ा समय लगता है। आपसे अनुरोध है कि आप अपनी भाषा को सामान्य व सरल बनाएं। ऐसा नहीं है कि मुझे शुद्ध हिन्दी के शब्दों के अर्थ नहीं मालूम इसलिए दिक्कत होती है। बल्कि आपके द्वारा प्रयुक्त प्रत्येक शब्द का अर्थ तो मालूम होता है पर पता नहीं क्या है। आपके लेखन में, कि उसे पढ़ना कठिन कार्य लगता है। ऐसे में सामान्य पाठकों को विषय के अतिरिक्त आपकी भाषा को समझने में समय देना होगा। लेख की अगर भाषा सरल हो तो कोई बिना रुके कई घंटे आपके लेखों को पढ़ सकता है। वहीँ अगर आपकी भाषा कठिन है तो थोड़ा सा पढ़कर ही मन खीझने लगता है। ऐसे में प्रयास करें की अपनी भाषा को अधिक व्यावहारिक बनाएं, जिससे पाठक आपके शब्दों को समझने की बजाये आपके विचारों में डूबने में समय लगाये।
    उदाहरण के लिए एक दिन मैं अभिषेक ओझा की गणित के अनसुलझे सवाल पर एक ब्लॉग को पढ़ रहा था। उनकी लेखन भाषा मुझे बेहद पसंद आई और मैं पढता गया। एक और एक और के चक्कर में पूरा विषय ही पढ़ डाला। और ये सब हुआ केवल भाषा शैली की वजह से.. आप भी इसका सिर्फ एक ही लेख पढ़िए जिसकी लिंक मैं दे रहा हूँ। मुझे लगता है कि आप भी धीरे-धीरे पूरे विषय को पढ़ डालेंगे। http://baatein.aojha.in/2008/07/vii.html धन्यवाद्

    • अनमोल, आपने पुस्तक की लेखन शैली पर अपने विचार रखे उसके लिए शुक्रिया..
      इस लेखन शैली के चुनाव के पीछे कुछ विशेष कारण है। वह है विषय का भौतिकी अर्थ… उदाहरण के लिए ब्रह्माण्ड के विस्तार से संबंधी चार भिन्न-भिन्न परिस्थितियाँ ज्ञात है। इनका भौतिकी में भिन्न-भिन्न अर्थ निकलता है। शब्दों अथवा वाक्यों की रचना की कमी से लोगों की सोच को नई दिशा मिल जाती है। फलस्वरूप अर्थ का अनर्थ बनने में समय नहीं लगता। मैंने देखा है कि इन्ही कमियों की वजह से अत्याधिक ताप और दाब जैसी परिस्थितियों को ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का कारण मान लिया है। और कुछ समय बाद यह अवधारणा बन जाती है। इस तरह की कमी को दूर करने का प्रयास हमारे द्वारा किया जा रहा है। आप लिंक (HOME » पुस्तक के अंश » कुछ और भी.. » सैद्धांतिक युक्ति) पर जाकर पुस्तक में किये जाने वाले सैद्धांतिक कार्य की शैली को देख सकतें हैं।
      मैं आपके इस सुझाव को सकारात्मक दृष्टी से देखते हुए, लेखन के कार्य को आगें बढ़ाने की पूर्णतः कोशिश करूँगा। एक बार पुनः शुक्रिया..

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