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प्राकृतिक नियम : भौतिकता के रूपों का आपसी व्यवहार


प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि ये नियम भौतिकता के रूपों का आपसी व्यवहार है। और वहीं व्यावहारिक नियम एक निश्चित सीमा तक व्यवस्था कायम करने की युक्ति है। प्राकृतिक नियम, ये वे नियम हैं जो टेस्ट टिउब बेबी, कृत्रिम खून, अविष्कार और कृत्रिम पौधे जैसी व्यवस्था को संचालित करते हैं। जबकि टेस्ट टिउब बेबी, कृत्रिम खून, अविष्कार और कृत्रिम पौधे जैसी चीजों को मनुष्य ने बनाया है !! इस स्थिति में “टेस्ट टिउब बेबी” या “कृत्रिम खून” को प्राकृतिक न मानना हमारी गलती होगी। प्राकृतिक नियम उन सभी चीजों में भी लागू होते है जिन्हें हम बना सकते हैं। वास्तव में ये उस पदार्थ में लागू होते हैं जिसके उपयोग से हम अपनी कल्पना को साकार रूप देते हैं। 32 नियमों के आधार पर ही ब्रह्माण्ड के समूह की अवधारणा सामने आई। ब्रह्माण्ड के समूह की अवधारणा के अनुसार एक से अधिक ब्रह्मांड का अस्तित्व संभव हैं। और इस असीम अंतरिक्ष में एक से अधिक ब्रह्माण्ड का अस्तित्व नियमों के आधार पर ही संभव है। तात्पर्य प्रत्येक ब्रह्माण्ड को नियमों के आधार पर ही भिन्न- भिन्न समझा जाता है। और उसे ब्रह्माण्ड की गिनती में शामिल कर लिया जाता है।

भौतिकता के रूपों का गुणधर्म


प्रत्येक अवयव, कण, पिंड, निकाय अथवा निर्देशित तंत्र किसी न किसी रूप में क्रियाएँ करते हैं। इन क्रियाओं को हम भौतिकता के रूपों (अवयव, कण, पिंड निकाय या निर्देशित तंत्र) के अस्तित्व की जरुरी शर्त मान सकते हैं। भौतिकता के रूपों के अस्तित्व के लिए जरुरी है कि वे सभी क्रियाओं में भागीदार हों। इस तरह ब्रहमांड के सभी मूलभूत अवयव जो किसी अन्य भौतिकता के रूपों से निर्मित नहीं हैं, ब्रहमांड के अन्य सभी अवयवों से संबंध बना पाते हैं। इसलिए ब्रह्माण्ड में भौतिकता के सभी रूप किसी न किसी रूप में गति करते हैं। क्योंकि ब्रहमांड में विरामावस्था की शर्तों का अस्तित्व ही नहीं है। भाषा विज्ञान में इस बात को तब प्रमाणिकता मिल जाती है। जब कुछ न करने अर्थात बैठे रहने को भी क्रिया के रूप में गिना लिया जाता है।

भौतिकता के रूपों का गुणधर्म

नोट :
१. एक समान वेग से की जाने वाली गति को स्थिर तथा निरपेक्ष माना जाता है।
२. ब्रह्माण्ड के अस्तित्व के लिए स्वाभाविक तथा स्वतः दोनों क्रियाएँ जिम्मेदार हैं।

भ्रम अथवा प्रायोगिक आभाव


जब दो रेलगाड़ियाँ एक ही दिशा में भिन्न-भिन्न वेग से गतिशील हों। तब आप देखेंगे कि कम वेग से गतिशील रेलगाड़ी अधिक वेग से गतिशील रेलगाड़ी के सापेक्ष पीछे-पीछे गतिशील न होकर, पीछे की ओर गतिशील होती हुई प्रतीत होती है। यह साधारण सापेक्षता का उदाहरण है।

भ्रम अथवा प्रायोगिक आभाव

विज्ञान में प्रतीत होने का दो तरह से अध्ययन किया जाता है। एक तो भ्रम की स्थिति को निर्धारित करने में.. और दूसरा तब जब सैद्धांतिक रूप से हमें यह ज्ञात हो जाता है कि प्रयोगों द्वारा इसे प्रमाणित नहीं की जा सकता। यही वह स्थिति होती है जब हम प्रकृति के समकक्ष होते हैं। उदाहरण स्वरुप प्रकाश की गति के समकक्ष वेग से गतिशील वस्तु की लम्बाई में कमी को मापने के लिए जरुरी है कि प्रेक्षक भी उसी वेग से गतिशील हो। अर्थात प्रेक्षक की लम्बाई में भी कमी आएगी। फलस्वरूप हम प्रकाश की गति से गतिशील वस्तु की लम्बाई की कमी को नहीं माप सकेंगे। क्योंकि मापन की क्रिया अनुपातिक क्रिया होती है। वस्तु तथा प्रेक्षक में समान अनुपात में कमी आएगी। क्योंकि वस्तु तथा प्रेक्षक की गति समान है। भ्रम की स्थिति साधारण सापेक्षता और प्रायोगिक कमी के रूप में आंकी जाने वाली स्थिति विशेष सापेक्षता के अंतर्गत आती है।