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चिकित्सा में नोबेल : कोशिकाओं की भाषा के नाम


चिकित्सा में २०१३ का नोबेल पुरुस्कार संयुक्त रूप से तीन वैज्ञानिकों (डॉ. रैंडी डब्लू. शेकमान, डॉ. जेम्स ए. रोथमन, डॉ. थॉमस सी. सूडाफ) को दिया गया है। आपने पुटिका (फफोला) के आवागमन की मशीनरी विनियमन को, जो कोशिकाओं की प्रमुख परिवहन प्रणाली है को खोज निकाला है। आप तीनों साथ-साथ न होकर भी कोशिकाओं की प्रमुख परिवहन प्रणाली को एक रूप में देखते है। तात्पर्य स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए आप तीनों वैज्ञानिकों ने विज्ञान की अलग-अलग विधियों का प्रयोग करके कोशिकाओं की परिवहन प्रणाली के भिन्न-भिन्न चरणों को एक घटना के रूप में पाया है। आप तीनों की संयुक्त खोज यह दर्शाती है कि प्रकृति इतने सूक्ष्म स्तर पर इतनी दक्षता के साथ परिवहन का कार्य कैसे करती है ?

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मानव जाति हज़ारों सालों से परिवहन का कार्य करती आ रही है। परिवहन के कार्य के लिए आवश्यक है कि निर्धारित लक्ष्य, समय, गंतव्य और निश्चित पाथ का ज्ञात होना। सटीक शब्दों में कहूं तो परिवहन के लिए आवश्यक है एक व्यवस्था का लागू होना। और व्यवस्था को सुचारु रूप से चलायमान रखने के लिए आवश्यक है नियमों का होना। चाहे वे नियम संचार की किसी भी भाषा शैली का उपयोग करते हों। वह भाषा शैली मौखिक, लिखित, सांकेतिक या निर्देशित हो सकती है। वर्तमान  में संचार और परिवहन के साधनों में विकास हुआ है। इस विकास के कारण आज हम पृथ्वी के अलावा अंतरिक्ष स्टेशनों से जुड़े हुए हैं।
आप तीनों नोबेल पुरुस्कार विजेताओं ने कोशिका के भीतर उपस्थित एक कोशिकांग से दूसरे कोशिकांग तथा कोशिका के बाहर से कोशिका के अंदर होने वाले पदार्थ-परिवहन की भाषा से हमें परिचित करवाया है। यह एक बेहतरीन भाषा प्रणाली है जो कोशिकाओं तथा कोशिकांग के बीच बोली और समझी जाती है। यह भाषा कोशिका के केन्द्रीयकरण पर आधारित होती है। यदि किसी कोशिका का पूर्व में केन्द्रीयकरण नहीं हुआ है यानि कि उस कोशिका में पदार्थ-परिवहन कोशिका के अंदर एक कोशिकांग से दूसरे कोशिकांग के मध्य हो रहा है। जिसे सुकेन्द्रकीय कोशिका कहा जाता है। और यदि कोशिका में पदार्थ-परिवहन एक कोशिका से दूसरी कोशिका की ओर हो रहा है यानि कि उस कोशिका का केन्द्रीयकरण पूर्व में ही हो गया है। जिसे पूर्व केन्द्रकीय कोशिका कहा जाता है। जिसकी रचना प्रकृति ने स्वतः करोड़ों वर्ष पूर्व ही कर दी थी। सुनियोजित या नियंत्रित होने की वजह से पूर्व केन्द्रकीय कोशिका की रचना सरल मालूम पड़ती है। इसके विपरीत सुकेन्द्रकीय कोशिका अत्यंत जटिल मालूम होती है। सुकेन्द्रकीय कोशिका को किसी देश की बंद अर्थव्यवस्था और पूर्व केन्द्रकीय कोशिका को किसी देश की खुली अर्थव्यवस्था के रूप में समझा जा सकता है और इस प्रकार पदार्थ-परिवहन की यह प्रणाली निर्देशित भाषा शैली का उपयोग करती है।
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विज्ञान के विकास के साथ ही हमने यह जान लिया था कि कोशिका के अंदर एक कोशिकांग से दूसरे कोशिकांग में तथा एक कोशिका से दूसरे कोशिका में पदार्थों का परिवहन बुलबुले जैसी संरचना के द्वारा होता है। यह बुलबुली संरचना वसीय पदार्थों की भित्ति से ढ़की होती है। प्रत्येक बुलबुली संरचना लगभग ५० नैनोमीटर व्यास की होती है। और यह संरचना मुकुलन की क्रिया से निर्मित होती है। परन्तु इस बुलबुली संरचना वाले पदार्थ का परिवहन सही गंतव्य की ओर सही समय के साथ कैसे होता है ? यह जानना अभी तक शेष था। आप तीनों वैज्ञानिकों के सहयोग से हमने यह जाना है। कि..
  1. डॉ. रैंडी डब्लू. शेकमान ने यीस्ट कोशिकाओं के उन जीनों को खोज निकाला जो कोशिकीय परिवहन का आनुवंशिक आधार तैयार करते हैं। जो जीवन के लिए अति आवश्यक है।
  2. डॉ. जेम्स ए. रोथमन ने जैवरसायनिक विधियों के प्रयोग से उन प्रोटीनों को खोज निकाला है। जो बुलबुली संरचना को किसी कोशिका से जुड़ने की क्रिया में मदद करते हैं। इन्ही प्रोटीनों की सहायता से बुलबुली संरचना का सही भाग कोशिका के सही हिस्से से जुड़ता है।
  3. डॉ. थॉमस सी. सूडाफ ने तंत्रिका विशेषज्ञ होने के नाते कोशिकाओं की निर्देशित शैली की भाषा को समझा। और बतलाया कि कैल्शियम आयन के रूप में संकेत (स्पर्श द्वारा) प्राप्त होने के बाद ही तंत्रिका कोशिका, तंत्रिसंचारियों का प्रवाह प्रारम्भ करती हैं। आपने इस प्रणाली की आण्विक मशीनरी को भी खोज निकाला है जो कैल्शियम आयन के संकेत के रूप में कार्य करती है।
डॉ. रैंडी डब्लू. शेकमान ने साथ ही साथ यह भी बतलाया कि जिन कोशिकाओं में पदार्थ-परिवहन की मशीनरी ठीक तरीके से कार्य नहीं करती है। जिसके कारण पदार्थ परिवहन रुक सा जाता है जिसे अनुवांशिक गुणों का कारण माना गया। और अंततः रैंडी ने उत्परिवर्तित जीन की खोज कर ही ली। रैंडी ने जो जीन यीस्ट में खोजे हैं। रोथमन ने वैसे ही जीन मानव कोशिका में भी पाए हैं। इससे यह पता चलता है कि एक बार विकसित हुई कोशिकीय परिवहन व्यवस्था विकास क्रम के साथ-साथ आगे बढ़ती रही है। नोबेल पुरुस्कार की घोषणा के बाद नए शोधों से वैज्ञानिक यह जानकर हैरान हैं कि डीएनए के जीनोम आनुवांशिक कोड लिखने के लिए दो अलग-अलग तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं। एक से पता चलता है कि प्रोटीन कैसे बना है और दूसरी भाषा में वह निर्देश शामिल है जिसके जरिये कोशिका जीन को नियंत्रित करती है। ये दोनों भाषा एक-दूसरे में समाहित हैं। वैज्ञानिकों ने प्रोटीन के निर्माण से संबंधित डीएनए के आनुवांशिक कोड को 1960 में ही सुलझा लिया था। लेकिन जीन नियंत्रण संबंधी उसकी दूसरी गुप्त भाषा अब तक अबूझ ही थी। शोधकर्ता डॉ. जॉन स्टेमैटोयानोपोलस के अनुसार, ‘आनुवांशिक कोड लिखने के लिए जीनोम 64 अक्षरों वाली वर्ण माला का प्रयोग करते हैं। इन्हें कोडोन कहते हैं। हमने इनमें से कुछ कोडोन को खोजा है और इन्हें डुयोंस नाम दिया है। ये डुयोंस ही जीन नियंत्रण की गुत्थी को सुलझाते हैं।’ उन्होंने बताया कि डुयोंस की खोज के कारण अब वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को किसी मरीज के जीनोम के विश्लेषण में आसानी होगी और इलाज के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी परिवर्तन होगा।

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